मानो मत, जानो

जानने का पहला कदम है–मानने से मुक्त हो जाना।
पहले चाहिए कि तुम्हारे चित्त की स्लेट खाली हो जाए। पोंछ डालो जो भी दूसरों ने लिख दिया है। धो लो स्लेट, साफ कर लो। कोरी कर लो तुम्हारी किताब। और मजा यह है कि कोरी किताब तुमने क्या की कि जैसे राम को आमंत्रण मिल जाता है। कोरी किताबों पर उतरता है वह फूल। कोरी किताबों पर आती है वह किरण। कोरी किताबों पर होता है वह विस्फोट। कोरी किताब यानी निर्दोष चित्त–मान्यताओं से, विश्वासों से मुक्त।

यह तो मधुशाला है

यह तो मैखाना है, मधुशाला है। यहां तो पियक्कड़ों की जमात है। ये रिंद बैठे हैं। यहां तो अदृश्य शराब पीई जा रही है, पिलाई जा रही है। अगर पीना हो, तो पीओ। और अगर हिम्मत हो, तो ही पी पाओगे। क्योंकि यहां किसी परंपरा की बात नहीं हो रही है। यहां शुद्ध सत्य की बात हो रही है। यहां किसी परंपरा का पोषण नहीं है। क्योंकि मैं मानता ही नहीं कि परंपरा और सत्य का कभी कोई संबंध होता है। सत्य तो सदा नूतन होता है; नित-नूतन होता है–जैसे सुबह की ओस के कण–इतना ताजा होता है।