विपस्सना : मनुष्य-जाति के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ध्यान-प्रयोग

विपस्सना मनुष्य-जाति के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ध्यान-प्रयोग है । जितने व्यक्ति विपस्सना से बुद्धत्व को उपलब्ध हुए उतने किसी और विधि से कभी नहीं । विपस्सना अपूर्व है ! विपस्सना शब्द का अर्थ होता है : देखना, लौटकर देखना । बुद्ध कहते थे : इहि पस्सिको, आओ और देखो ! बुद्ध किसी धारणा का आग्रह नहीं रखते । बुद्ध के मार्ग पर चलने के लिए ईश्वर को मानना न मानना, आत्मा को मानना न मानना आवश्यक नहीं है । बुद्ध का धर्म अकेला धर्म है इस पृथ्वी पर जिसमें मान्यता, पूर्वाग्रह, विश्वास इत्यादि की कोई भी आवश्यकता नहीं है । बुद्ध का धर्म अकेला वैज्ञानिक धर्म है । बुद्ध कहते : आओ और देख लो । मानने की जरूरत नहीं है । देखो, फिर मान लेना । और जिसने देख लिया, उसे मानना थोड़े ही पड़ता है; मान ही लेना पड़ता है । और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी, दिखाने की जो प्रक्रिया थी, उसका नाम है विपस्सना ।

विपस्सना बड़ा सीधा-सरल प्रयोग है । अपनी आती-जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव । श्वास जीवन है । श्वास से ही तुम्हारी आत्मा और तुम्हारी देह जुड़ी है । श्वास सेतु है । इस पार देह है, उस पार चैतन्य है, मध्य में श्वास है । यदि तुम श्वास को ठीक से देखते रहो, तो अनिवार्य रूपेण, अपरिहार्य रूप से, शरीर से तुम भिन्न अपने को जानोगे । श्वास को देखने के लिए जरूरी हो जायेगा कि तुम अपनी आत्मचेतना में स्थिर हो जाओ । बुद्ध कहते नहीं कि आत्मा को मानो । लेकिन श्वास को देखने का और कोई उपाय ही नहीं है । जो श्वास को देखेगा, वह श्वास से भिन्न हो गया, और जो श्वास से भिन्न हो गया वह शरीर से तो भिन्न हो ही गया । क्योंकि शरीर सबसे दूर है; उसके बाद श्वास है; उसके बाद तुम हो । अगर तुमने श्वास को देखा तो श्वास के देखने में शरीर से तो तुम अनिवार्य रूपेण छूट गए । शरीर से छूटो, श्वास से छूटो, तो शाश्वत का दर्शन होता है । उस दर्शन में ही उड़ान है, ऊंचाई है, उसकी ही गहराई है । बाकी न तो कोई ऊंचाइयां हैं जगत में, न कोई गहराइयां हैं जगत में । बाकी तो व्यर्थ की आपाधापी है ।

फिर, श्वास अनेक अर्थों में महत्वपूर्ण है । यह तो तुमने देखा होगा, क्रोध में श्वास एक ढंग से चलती है, करुणा में दूसरे ढंग से । दौड़ते हो, एक ढंग से चलती है; आहिस्ता चलते हो, दूसरे ढंग से चलती है । चित्त ज्वरग्रस्त होता है, एक ढंग से चलती है; तनाव से भरा होता है, एक ढंग से चलती है; और चित्त शांत होता है, मौन होता है, तो दूसरे ढंग से चलती है । श्वास भावों से जुड़ी है । भाव को बदलो, श्वास बदल जाती है़ । श्वास को बदल लो, भाव बदल जाते हैं । जरा कोशिश करना । क्रोध आये, मगर श्वास को डोलने मत देना । श्वास को थिर रखना, शांत रखना । श्वास का संगीत अखंड रखना । श्वास का छंद न टूटे । फिर तुम क्रोध न कर पाओगे । तुम बड़ी मुश्किल में पड़ जाओगे, करना भी चाहोगे तो क्रोध न कर पाओगे । क्रोध उठेगा भी तो भी गिर-गिर जायेगा । क्रोध के होने के लिए जरूरी है कि श्वास आंदोलित हो जाये । श्वास आंदोलित हो तो भीतर का केंद्र डगमगाता है । नहीं तो क्रोध देह पर ही रहेगा । देह पर आये क्रोध का कुछ अर्थ नहीं है, जब तक कि चेतना उससे आंदोलित न हो । चेतना आंदोलित हो, तो ज़ुड गये ।

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