बुद्ध



जहां तक पुराने संतों का सवाल है करुणा पर गौतम बुद्ध का जोर एक बहुत ही नई घटना थी। गौतम बुद्ध ने ध्यान को अतीत से एक ऐतिहासिक विभाजन दिया है; उनसे पहले ध्यान अपने आप में पर्याप्त था, किसी ने भी ध्यान के साथ करुणा पर जोर नहीं दिया। और उसका कारण था की ध्यान संबुद्ध बनाता है, तुम्हें खिलावट देता है, ध्यान तुम्हारे होने की चरम अभिव्यक्ति है। इससे ज़्यादा तुम्हे और क्या चाहिए? जहां तक व्यक्ति का सम्बन्ध है, ध्यान पर्याप्त है। गौतम बुद्ध की महानता इस बात में समाहित है कि तुम ध्यान करने से पहले करुणा से परिचित हो जाओ। तुम अधिक प्रेमपूर्ण, अधिक दयावान, अधिक करुणावान हो जाओ।

इसके पीछे एक छिपा हुआ विज्ञान है। इससे पहले कि व्यक्ति संबुद्ध हो यदि उसके पास एक करुणा से भरा ह्रदय हो तो संभावना बनती है कि ध्यान के उपरान्त वह दूसरों को वही सौंदर्य, वही ऊंचाई, वही उत्सव जो उसने खुद हासिल किया है, पाने में मदद कर सके। गौतम बुद्ध ने संबोद्धि को संक्रामक बना दिया है। पर यदि कोई व्यक्ति महसूस करे कि वह घर लौट आया है, तो फिर किसी और की क्या चिंता लेनी?

बुद्ध ने पहली बार आत्मज्ञान को निस्वार्थ बनाया है; उन्होंने इसे सामाजिक जिम्मेदारी बनाया है। यह एक महान परिवर्तन है। लेकिन आत्मज्ञान से पहले करुणा सीख लेनी चाहिए। यदि इसे पहले सीखा ना गया तो आत्मज्ञान के उपरान्त कुछ भी सीखने को नहीं बचता। जब कोई अपने आप में उन्माद से भर जाता है तो करुणा तक उसकी खुद की प्रसन्नता में बाधा बन जाती है -उसके उन्माद में एक प्रकार का विघ्न पड़ जाता है… इसलिए सैकड़ों आत्मज्ञान को उपलब्ध हुए हैं परंतु सद्गुरु बहुत कम।

संबुद्ध हो जाने का मतलब जरूरी नहीं कि तुम सद्गुरु भी हो जाओ। सद्गुरु हो जाने का अर्थ यह के तुम मे अनंत करुणा है, और तुम अपने भीतर की उस परमशांति के सौंदर्य में अकेले जाने से शर्मिंदगी महसूस करते हो जो तुमने आत्मज्ञान द्वारा प्राप्त की है। तुम उन लोगो की मदद करना चाहते हो जो अंधे हैं, अन्धकार में हैं और अपने लिए मार्ग टटोल रहें हैं। उनकी मदद करना आनंददायी है, ना कि कोई बाधा।

असलियत में तो, जब तुम अपने आस-पास बहुत सारे लोगों को खिलते देखोगे; तो यह एक और ज्यादा समृद्ध आनंद बन जाता है; तुम एक बंजर जंगल में अकेले वृक्ष नहीं हो जो उग गया है, जहां कोई और वृक्ष नहीं उग रहा। जब तुम्हारे साथ सारा जंगल खिलता है तो आनंद हजारों गुना बढ़ जाता है; तुमने अपने आत्मज्ञान को दुनिया में क्रान्ति लाने के लिए उपयोग किया। गौतम बुद्ध केवल आत्मज्ञानी नहीं हैं, लेकिन एक आत्मज्ञानी क्रांतिकारी।

उनकी चिंता इस दुनिया के, लोगो के प्रति गहरी है। वे अपने शिष्यों को सिखाते थे की जब तुम ध्यान करो और उससे तुम्हे मौन और शान्ति मिले, तुम्हारे भीतर गहरे आनंद के बुलबुले उठने लगे तो; उसे रोको मत, उसे पुरे संसार में बांटो। और कोई चिंता ना लो, क्योंकि जितना तुम दोगे उतना ही तुम और देने के लिए सक्षम हो जाओगे। देने का भाव बहुत महत्व रखता है क्योंकि एक बार तुम्हे इस बात का पता चल जाए कि देने से तुम कुछ खोते नहीं बल्कि इसके विपरीत, यह तुम्हारे अनुभवों को कई गुना बढ़ा देता है। परंतु जिस व्यक्ति ने कभी करुणा नहीं जानी उसे देने के रहस्य का पता नहीं, उसे बांटने के रहस्य का पता नहीं।

~ ओशो
The New Dawn, Talk #22

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