जे.कृष्णामूर्ति

Indian philosopher Jiddu Krishnamurti arrived in Sydney, 14 November 1970. SMH

कृष्णामूर्ति इसलिए असफल हुए क्योंकि वे मनुष्य के ह्रदय को छू ना सके; वे केवल मनुष्य के सिर तक ही पहुँच सके। ह्रदय कुछ और ही दृष्टिकोण मांगता है। मेरा पूरा जीवन यही अंतर रहा है मेरे और उनके दृष्टिकोण में : जब तक मनुष्य के ह्रदय तक पहुँचा ना जाये, तब तक तुम तोते की तरह, सुन्दर शब्द दोहराते रह सकते हो– उनका कोई अर्थ नहीं है। कृष्नामूर्ति जो भी कह रहे थे वह सत्य है, लकिन वह उन्हें तुम्हारे हृद्य से संबन्धित करने में असमर्थ रहे । दुसरे शब्दों में, मैं यह कह रहा हूँ कि जे। कृष्नामूर्ति एक महान दर्शनवादी थे पर वे एक सद्गुरु नहीं बन पाए। वे लोगों की मदद नहीं कर सके, लोगों को एक नए जीवन के लये तैयार करना, एक नई दिशा ।

परन्तु इसके बावजूद मैं उन से प्रेम करता हूँ, क्योंकि दार्शनिकों में वे जीवन के रहस्यवादी मार्गों के सबसे ज्यादा निकट पहुँच पाए। उन्होंने खुद ही रहस्यवादी मार्ग की अवहेलना की, उसे नज़रअंदाज़ कर दिया और इस कारणवश वे असफल हुए। परन्तु आधुनिक समकालीन विचारकों में वे अकेले ही हैं जो रहस्यवाद के बहुत निकट तक पहूँच पाए, लगभग उसकी सीमा रेखा पर और वहीँ रुक गए। संभवतः वे डरे होंगे कि यदि वे रहस्यवाद की बात करेंगे तो लोग रहस्यवाद के उन्ही पुराने ढंगों, पुरानीं परम्पराओं और पुराने दर्शन में गिरने लगेंगे। यह डर ही उन्हें इसमें प्रवेश करने से रोकता रहा। किन्तु उनका यही डर दूसरे लोगों को भी जीवन के रहस्यों में प्रवेश करने से रोक देता है।

मैं कृष्णमूर्ति के हजारों लोगों से मिला हूँ–क्योंकि जिसने भी कृष्णमूर्ति में रुचि ली है देर – सवेर वो मुझ तक अपना मार्ग खोजनेमें बाध्य हो जायेगा, क्योंकि कृष्णमूर्ति उन्हें जहाँ छोड़ते हैं, वहां मैं उनका हाथ पकड़कर उनका सत्य के अन्तरतम मंदिर में मार्गदर्शन करता हूँ। तुम कह सकते हो कि कृष्णमूर्ति से मेरा सम्बद्ध यह है कि कृष्णमूर्ति ने मेरे लिए भूमि तैयार कर दी है। उन्होंने लोगो को मेरे लिए बौद्धिक रूप से तैयार कर दिया है; अब यह मेरा काम है कि मैं उन्हें बुद्धि से गहरे ले जाऊं, ह्रदय तक; और ह्रदय से गहरे, अंतरआत्मा तक।

~ ओशो
Socrates Poisoned Again After 25 Centuries, Talk #25

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