जे.कृष्णामूर्ति


कृष्णमूर्ति चालीस-पचास वर्षों से लगातार कहते आएं हैं: “किसी का अनुकरण मत करो। लोग बिना किसी का अनुकरण किये पहुँच सकते हैं”–पर यह मार्ग कठिन और लंबा है क्योंकि तुम्हे जो भी संभव मदद या मार्गदर्शन दिया जा सकता है तुम उसे स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होगे जो की संभव है और जो तुम्हारे मार्ग की बहुत सी अनावश्यक कठिनाइयों को काट सकता है। यही है जो कृष्णमूर्ति कहते आएं हैं–किसी ने यह नहीं किया है।

यही मन की समस्या है। मन यह स्वीकार कर सकता है–इसलिए नहीं कि उसे यह समझ आ गया है, पर इसलिए कि किसी का अनुकरण ना करना अहंकार के लिए संतुष्टिदायक होता है । कोई किसी का अनुकरण नहीं करना चाहता। बहुत गहरे में अहंकार इसका विरोध करता है।

इसलिए कृष्णमूर्ति के आस-पास सारे अहंकारी एकत्रित हो गए हैं। वे फिर अपने आप को धोका दे रहें है। वे सोचते हैं कि वे किसी का अनुकरण नहीं कर रहे क्योंकि उन्हें अनुकरण करने के पीछे का भ्रम समझ आ गया है, उन्हें समझ में आ आ गया है कि इस मार्ग पर अकेले ही चला जा सकता है, उन्हें समझ में आ गया है कि कोई मदद संभव नहीं है, कोई तुम्हारी मदद नहीं कर सकता, कोई तुम्हारा मार्गदर्शन नहीं कर सकता; तुम्हे अकेले ही यात्रा करनी होगी। उन्हें लगता है कि उन्हें यह समझ में आ गया है, इसीलिए वे किसी का अनुसरण नहीं कर रहे। यह सत्य बात नहीं है–वे धोखा दे रहें हैं। वे इसलिए अनुसरण नहीं कर रहे क्योंकि उनका अहंकार उन्हें इसकी अनुमति नहीं दे रहा।

और, फिर भी वे कृष्णमूर्ति को सुनते चले जा रहें हैं। सालों साल तक वे फिर-फिर जातें हैं।

यदि कोई मदद ही संभव नहीं है तो फिर आप कृष्णमूर्ति के पास बार-बार जा क्यों रहें है? यदि कोई मार्गदर्शन कर ही नहीं सकता, तो उन्हें बार-बार सुनने का क्या अर्थ है? यह व्यर्थ है। और यह मनोदृष्टि कि यात्रा तुम्हे अकेले करनी है, तुमने नहीं खोजी है–कृष्णमूर्ति ने ही तुम्हे दी है। गहरे में वे तुम्हारे गुरु बन गए हैं। लेकिन तुम यह कहे चले जाते हो कि तुम किसी का अनुसरण नहीं कर रहे–यह एक धोका है।

यही धोका विपरीत ओर से भी हो सकता है। तुम मेरे पास आते हो, तुम सोचते हो कि तुमने समर्पण कर दिया, और तब भी तुम चयन करते जाते हो। यदि मैं तुम से कुछ कहता हूँ जो तुम्हे जंचता है–तो इसका अर्थ है कि वह तुम्हारे अहंकार को जंचता है–तुम उसका पालन करते हो। यदि मैं कुछ कहता हूँ जो तुम्हे नहीं जंचता, तुम उससे तर्क बिठाने लगते हो: “यह शायद मेरे लिए नहीं है।” तो तुम्हे लगता है कि तुमने समर्पण किया , तुमने समर्पण किया नहीं है।

कृष्णमूर्ति के पास इकठ्ठा हुए लोग सोचते हैं कि वे किसी का अनुसरण नहीं कर रहे, और वे अनुसरण कर रहे हैं। मेरे पास तुम सोचते हो कि तुम मेरा अनुसरण कर रहे हो, और तुम नहीं कर रहे। मन हमेशा एक धोकेबाज है। तुम कहीं भी जाओ वह तुम्हे धोका दे सकता है, वह तुम्हे धोका देगा–तो सचेत रहो।

~ ओशो
My Way: The Way of the White Clouds, Talk #12

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