जे. कृष्णमूर्ति



जे. कृष्णमूर्ति, एक ऐसे व्यक्ति जिन्होंने नब्भे साल तक संघर्ष किया–उनके अंतिम शब्द बेहद सार्थक हैं। मेरे एक मित्र वहां उपस्थित थे। कृष्णमूर्ति ने शिकायत प्रकट की, उन्होंने अपने पुरे जीवन के प्रती शिकयत प्रकट की। उनकी शिकायत थी कि “लोगों ने मुझे एक मनोरंजन की भाँती लिया। वे मेरी बातें सुनने आतें हैं….” ऐसे लोग हैं जिन्होंने उन्हें पचास वर्षों से लगातार सुना है, और फिर भी वे वैसे के वैसे ही हैं जैसे वो तब थे जब वे उन्हें पहली बार सुनने आये थे।

स्वाभाविक है कि यह परेशान कर देने वाला और कष्टप्रद है कि वही लोग…. उनमे से ज्यादातर लोगों को मैं जानता हूँ, क्योंकि कृष्णमूर्ति वर्ष में केवल एक बार, दो या तीन हफ़्तों के लिए बॉम्बे आया करते थे, और धीरे-धीरे उनके सारे अनुयायी मुझसे परिचित हो गए। वे सब इस बात को लेकर उदास थे: ‘क्या किया जाए? हम कृष्णमूर्ति को कैसे खुश कर सकते हैं?’ कारण यह था कि कृष्णमूर्ति केवल बात करते थे, परंतु उन्होंने उन बातों में चुर्चित विषयों को अनुभव में परिवर्तित करने के लिए कभी भी कोई विधि नहीं दी। इसमें पूरा दोष उनका है। जो भी वे कह रहे थे वह पूर्णतः सत्य था, परंतु वे एक उपयुक्त वातावरण, एक उयुक्त परिवेश निर्मित नहीं कर रहे थे जिसमें यह एक बीज बन जाये। बेशक वे मनुष्यता को लेकर बहुत निराश थे, और इस बात को लेकर भी कि एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो उनके शिक्षण के द्वारा संबुद्ध हुआ हो। उनके शिक्षण में सब बीज उपस्थित हैं, किन्तु उन्होंने भूमि तैयार नहीं की।झेन मनोरंजन का निषेध नहीं करता, जिस तरह मनोरंजन की निंदा कृष्णमूर्ति ने अपने अंतिम टेस्टामेंट में पूरी दुनिया के सामने की। उन्होंने कहा, “धर्म मनोरंजन नहीं है।” यह सत्य बात है, किन्तु संबुद्ध होने का अनुभव इतना विशाल हो सकता है कि उसमे मनोरंजन भी समा सकता है।

संबोद्धि बहुआयामी हो सकती है। वह अपने में हंसी को समाहित कर सकती है, वह अपने में प्रेम को समाहित कर सकती है, वह अपने में सौंदर्य और सृजनात्मकता को समाहित कर सकती है। ऐसा कुछ भी नहीं है जो उसे दुनिया से छिपा के रख सके, दुनिया को एक ज्यादा काव्यात्मक स्थान में परिवर्तित होने से, एक ज्यादा सुन्दर फूलों की बगिया बनने से रोक सके। हर चीज़ को एक ज़ियादा सुन्दर स्तिथि तक पहुँचाया जा सकता है ।

~ ओशो
Rinzai: Master of the Irrational, Talk #5

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